एग्जिट पोल : इशारा तो कर ही जाते हैं

अवधेश कुमार,

कर्नाटक चुनाव के एग्जिट पोल यानी मतदान बाद सर्वेक्षणों के बाद दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टयिों की धड़कने बढ़ गई होंगी। सभी सर्वेक्षण एक समान परिणाम देते तो शायद ऐसी स्थिति नहीं होती। हमारे सामने राष्ट्रीय स्तर पर आठ एग्जिट पोल आए हैं। इनमें से चार ने भाजपा को या तो बहुमत दिया है या उसे बहुमत के करीब बता दिया है। एक ने कांग्रेस को बहुमत दिया है या उसके आसपास रखा है। एक ने भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी तो बता दिया है लेकिन बहुमत से थोड़ा नीचे रखा है। एक ने कांग्रेस को बड़ी पार्टी बताते हुए भी बिल्कुल त्रिशंकु विधानसभा की भविष्यवाणी की है।
सभी एग्जिट पोल का अगर औसत निकालें तो भाजपा को 101, कांग्रेस को 87, और जद-से को 32 सीटें प्राप्त होतीं हैं। यानी किसी पार्टी को बहुमत नहीं है। इसके आधार पर सरकार बनाने का दारोमदार जद (सेक्युलर) पर निर्भर करेगा। वह जिसको समर्थन देगा उसकी सरकार बनेगी या फिर वह खुद सरकार बनाने की शर्त रख सकता है। देश में पहले भी ऐसा हुआ है जब बड़ी पार्टी के साथ अन्य पार्टियों ने या तो छोटे दल को समर्थन दिया है या उसमें शामिल हुए हैं। लेकिन ऐसे प्रयोग कभी सफल नहीं रहे। ऐसी सारी सरकारें खींचतान और साथी दलों के दबाव का शिकार रही और धक्का खाते-खाते असमय गिर गई। कर्नाटक में भी मिली-जुली सरकार का प्रयोग हो चुका है। 2004 में पहले जद (सेक्युलर) एवं कांग्रेस की सरकार बनी और बाद में उसके गिरने के बाद जद (सेक्युलर) एवं भाजपा की लेकिन यह सरकार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। प्रश्न है कि क्या कर्नाटक के लोग उतने कड़वे और दुखद अनुभव के बाद उसे दोहराना चाहेंगे? सबसे पहले तो यह समझने की आवश्यकता है कि एग्जिट पोल का औसत निकालना कोई वैज्ञानिक तरीका नहीं है।
इस आधार पर किसी प्रकार का निष्कर्ष निकालने का अर्थ ही नहीं है। बहुत सारे लोग आपिनियन पोल यानी मतदान पूर्व सर्वेक्षण और एग्जिट पोल यानी मतदान बाद सर्वेक्षण को गंभीरता से नहीं लेते। दलों की अपनी समस्या है। अगर उनके पक्ष में पोल के परिणाम आए तो वे उसका समर्थन करते हैं, नहीं आए तो नकारते हैं, उनका उपहास उड़ाते हैं। मेरा अपना अनुभव है कि ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल चुनाव की प्रवृत्तियों को समझने के वैज्ञानिक तरीके हैं। इसे बिल्कुल ईमानदारी और गंभीरता से अंजाम दिया जाए, फिर आंकड़ों का विश्लेषण सही तरीके से हो तो आप जनता के रुख के निकट पहुंच सकते हैं। पश्चिमी देशों में ओपिनियन पोल एवं एग्जिट पोल से परिणाम आने के पूर्व ही लोगों को आभास हो जाता है कि किसकी सरकार बन रही है? हालांकि एकाध बार वहां भी ये पोल गलत साबित हुए हैं। किंतु गलत साबित होने का अर्थ यह नहीं कि यह बेकार की कवायद है या इनकी वैज्ञानिकता का दावा गलत है। वैसे हमारे यहां राजनीतिक दलों में जबसे जनता के बीच जाकर उनके साथ काम करने की प्रवृत्ति क्षीण हुई है, चुनाव जीतने के लिए कई बेईमान तरीके अपनाए जाते हैं। इसमें से एक है, सर्वेक्षण परिणामों द्वारा मतदाताओं पर मनोवैज्ञानिक असर डालना। कुछ लोगों या संस्थाओं की गलतियों का अर्थ यह नहीं कि हम उस विधा को ही गलत मान लें।
एग्जिट पोल मतदान करके निकल रहे मतदाताओं के मतों पर आधारित होता है। इसलिए इसको यदि वैज्ञानिक तरीके से किया जाए तो यह एकदम परिणाम का पूर्ण परावर्तन भले न हो लेकिन उसके निकट हो सकता है। हां, मत प्रतिशत को सीटों में बदलने की गणना जरा कठिन और जोखिम भरी होती है। किंतु प्रवृत्तियां गलत नहीं हो सकतीं। यानी इसमें भले किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला हो मगर जिस पार्टी को सबसे आगे बताया गया है वह बहुमत प्राप्त कर सकती है। उदाहरण के लिए; उत्तर प्रदेश चुनाव के एक्जिट पोल में कई एजेंसियों ने भाजपा को बहुमत दिया था तो कई ने भाजपा को बहुमत नहीं दिया लेकिन उसे सबसे बड़ी पार्टी बताया था। कई बार विश्लेषण करने वालों पर भी मनोवैज्ञानिक असर होता है। मसलन, यदि किसी दल को आकलन में बहुत ज्यादा सीटें आ रहीं हैं तो फिर वे विचार करने लगते हैं कि यदि परिणाम में इतनी सीटें नहीं आई तो उनकी साख गिर जाएगी। इसलिए इसका कई तरीकों से दोबारा-तीबारा विश्लेषण करके एक औसत सीट संख्या दे देते हैं। विखंडनवादी राजनीति का दौर जब से आरंभ हुआ, यह दबाव ज्यादातर विश्लेषण करने वालों पर रहा कि कोई पार्टी यदि एग्जिट पोल में पूर्ण बहुमत पा रही है तो उसे वाकई दिखाया जाए या नहीं।
मुझे याद है 2007 एवं 2012 के उत्तर प्रदेश के एग्जिट पोल में कई एजेंसी के प्रतिनिधियों ने बताया कि वो क्रमश: बसपा एवं सपा को पूर्ण बहुमत देख रहे थे परंतु राजनीति की प्रवृत्तियों देखते हुए उनने गणना के निष्कर्ष की कई बार समीक्षा की एवं फिर उन्हें आगे तो दिखाया। लेकिन पूर्ण बहुमत नहीं दिया। महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर और कुछ छोटे राज्यों को छोड़ दें तो जनता पूर्ण बहुमत की सरकार बना रही है। ऐसे में एग्जिट पोल करने वालों को पहले के मनोवैज्ञानिक दबाव से बाहर निकल जाना चाहिए। कर्नाटक में भी हमने देखा है कि लोगों ने एक बार के प्रयोग के बाद 2008 में भाजपा को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया कि वो आसानी से सरकार बना ले। फिर भाजपा का राजनीतिक प्रबंधन विफल हुआ, कई बार सरकार गिरते-गिरते बची, येदियुरप्पा पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद पार्टी ने उनके साथ सख्ती की। नतीजतन उन्होंने विद्रोह करके अलग पार्टी बना ली तो मतदाताओं ने दोनों को ठुकराते हुए कांग्रेस को पूर्ण बहुमत दे दिया।
इन प्रवृत्तियों को देखते हुए जब तक वास्तविक परिणाम न आ जाए यह मानना कठिन है कि वाकई कर्नाटक की जनता ने बहुमतविहीनता की स्थिति का चयन किया है। वास्तव में ज्यादातर एग्जिट पोल का निष्कर्ष यही है कि पूरे प्रदेश में एक समान किसी दल या नेता के विपक्ष या पक्ष में कोई बड़ी लहर नहीं है। एकाध क्षेत्रों में लहर दिखाई दे रहा है। उदाहरण के लिए तटीय कर्नाटक में भाजपा के पक्ष में भारी रु झान दिखा है। लेकिन यह स्थिति पूरे कर्नाटक में नहीं है। इसी तरह दक्षिण मैसूर क्षेत्र में माना जा रहा था कि जद-से के पक्ष में हवा होगी लेकिन एक्जिट पोल ने दिखाया है कि कांग्रेस ने वहां उसे पूरी टक्कर दी है। इन सबका निष्कर्ष निकालने के लिए हम स्वतंत्र हैं लेकिन यह मतदान प्रवृत्तियों को तो दर्शा ही रहे हैं। बहरहाल, 15 मई की प्रतीक्षा करते हैं।