एक साथ चुनाव

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रयोगधर्मी राजनेता हैं। उनका महती राजनीतिक सपना है कि देश में लोक सभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ हों। चुनाव सुधार की दृष्टि से यह प्रगतिशील विचार है। अगर इस प्रस्ताव के पक्ष में आम राय बन जाती है, तो चुनाव खर्च पर संतोषजनक पाबंदी लग सकती है।

देश में साल भर कहीं न कहीं कोई न कोई चुनाव होते रहते हैं, जाहिर है कि इस मद में बड़े पैमाने पर पैसा पानी की तरह बहाया जाता है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि प्रधानमंत्री के इस प्रस्ताव के पक्ष में राजनीतिक दलों के बीच सहमति नहीं बन पा रही है। गैर-एनडीए दलों में समाजवादी पार्टी, अन्ना द्रमुक, तेलंगाना राष्ट्र समिति और बीजद ने प्रस्ताव का समर्थन किया है, जबकि तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, तेलुगू देशम, माकपा, भाकपा आप, जनता दल (एस) और फॉर्वड ब्लॉक ने विरोध जताया है।

कांग्रेस अभी अपना पत्ता खोली नहीं है और भाजपा सभी दलों के विचार जानने के बाद ही विचार प्रकट करेगी। हालांकि भाजपा इस प्रस्ताव का समर्थन ही करेगी। विरोध करने वाले राजनीतिक दल इस प्रस्ताव को अलोकतांत्रिक और संघीय व्यवस्था की प्रकृति के प्रतिकूल ठहरा रहे हैं। वास्तव में इनके तकरे से सहमत नहीं हुआ जा सकता क्योंकि ऐसा लगता है कि इन राजनीतिक दलों को देश के राजनीतिक इतिहास की जानकारी नहीं है। 1952 के पहले आम चुनाव से लेकर 1967 तक लोक सभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही होते थे।

इसलिए कि उन दिनों देश में एक पार्टी यानी कांग्रेस का प्रभुत्व था। लेकिन जनाकांक्षाओं को पूरा करने में जब कांग्रेस असफल होने लगी तब क्षेत्रीय पार्टियों का विकास हुआ और राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल प्रभावित होने लगे। इसलिए यह यह नहीं कहा जा सकता कि इस प्रस्ताव से संविधान की बुनियादी संरचना बदल जाएगी। सच तो यह है कि यह व्यवस्था लागू होने से राष्ट्रीय दल मजबूत हो सकते हैं, और क्षेत्रीय दलों का प्रभाव कम हो जाएगा।

इसका परिणाम यह होगा कि देश में द्विदलीय प्रणाली का विकास हो सकता है, जो लोकतंत्र और राष्ट्रीय हित, दोनों के लिए सकारात्मक है। इसलिए क्षेत्रीय दलों को अपने छोटे-छोटे राजनीतिक स्वाथरे को तिलांजलि देकर राष्ट्र हित में सोचना चाहिए। अमेरिका और इंग्लैंड जैसे विकासित देशों में लोकतंत्र की सफलता का एक कारण यह भी है कि वहां द्विदलीय व्यवस्था है।