उम्मीद जगाता प्रदर्शन

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भारत ने जकार्ता में संपन्न एशियाई खेलों में अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है। भारत ने इस बार 15 स्वर्ण और 24 रजत पदक से 69 पदक जीते हैं। इससे पहले सर्वाधिक पदक जीतने का रिकॉर्ड 2010 के ग्वांगझू खेलों में 65 पदकों का था। भारत ने नई दिल्ली में 1951 में हुए पहले खेलों में 15 स्वर्ण पदक जीते थे और हमें इन 15 स्वर्ण पदकों तक पहुंचने में 67 साल लग गए हैं। इन खेलों से दो सकारात्मक बातें निकलकर आई हैं। एक तो भारतीय प्रदर्शन का आगे बढ़ता ट्रेंड नजर आ रहा है। दूसरे इस बार युवा खिलाड़ियों ने मोर्चा संभालकर देश को इस मुकाम तक पहुंचाया है। हम इन खेलों में पिछले कुछ सालों से लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं, यह अच्छा संकेत है। वहीं युवा खिलाड़ियों का पदक जीतने में दबदबा रहा है। इन खेलों में भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन एथलेटिक्स में रहा है। इसमें भारत ने सात स्वर्ण पदकों के सहयोग से 19 पदक जीते हैं। नीरज चोपड़ा ने जिस तरह से जेवलिन में 88.06 मीटर की थ्रो करके स्वर्ण पदक जीता, उससे लगता है कि वह टोक्यो से पदक के साथ लौट सकते हैं। यही नहीं हिमा दास और दुती चंद में भी क्षमता है। भारत ने कुछ बहुत ही करीबी मुकाबलों में स्वर्ण पदक को खोया है, जिन्हें थोड़ी मजबूत मानसिकता के साथ जीता जा सकता था। भारत ने बैडमिंटन, टेबल टेनिस, कुश्ती और मुक्केबाजी में पदक जीते पर एथलेटिक्स के बाद निशानेबाजी में सबसे अच्छा प्रदर्शन किया। निशानेबाजी में स्वर्ण जीतने वाले सौरभ चौधरी और शादरुल तो 16 साल के हैं। ऐसी प्रतिभाओं को मांजकर ओलंपिक के लिए तैयार किया जा सकता है। पर हॉकी और कबड्डी में स्वर्ण पदक नहीं जीत पाने से निराशा हुई है। हॉकी में प्रदर्शन में एकरूपता लाने की जरूरत है तो कबड्डी में बादशाहत वाले रवैये को छोड़कर गंभीरता से प्रयास करने की जरूरत है। भारत ने जकार्ता एशियाई खेलों में इन दोनों स्पर्धाओं में क्षमता के अनुसार प्रदर्शन करके तीन गोल्ड और जीते होते तो वह आठवें के बजाय सातवें स्थान पर रह सकती थी। भारत ने इस बार 20-22 ऐसे खेलों में करीब 228 खिलाड़ी भेजे, यहां एक भी पदक नहीं मिला। इस मसले पर ध्यान देने की जरूरत है। अच्छा प्रदर्शन करने वाली यंग ब्रिगेड को अभी से 2020 के टोक्यो ओलंपिक की तैयारी में जुटा देना चाहिए। यही वक्त की मांग है।