उपवास या उपहास

,

औपचारिक-अनौपचारिक बातचीत में अक्सर यह जुमला सुनने को मिलता रहता है कि गांधी को भुलाने-बिसराने और हाशिये पर डालने में कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं का सबसे अहम योगदान है। यह जुमला पिछले दिनों कांग्रेस नेताओं के किए धरे से उस समय पुष्ट होता दिखा  जब बीते सोमवार को गांधी के समाधि स्थल राजघाट पर कांग्रेस पार्टी की ‘सद्भावना’ उपवास कार्यक्रम से पहले और उपवास के दौरान हुई घटनाओं से इस बात की तस्दीक होती है।

कांग्रेस पार्टी ने जातीय हिंसा, सांप्रदायिकता और भाजपा पर संसद नहीं चलने देने का आरोप लगाते हुए देश में शांति और सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देने के लिए ‘सद्भावना’ उपवास रखा था। लेकिन उपवास में बैठने से पहले ही दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता चांदनी चौक की देश भर में प्रसिद्ध चैना राम की दुकान पर पिकनिक मनाने पहुंच गए।

सोशल मीडिया पर छोले-भठूरे की खाते हुए नेताओं की तस्वीर वायरल होते ही इनका उपवास उपहास में  बदल गया। रही सही कसर सिख विरोधी दंगों के आरोपी कांग्रेस नेता सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर ने उपवास स्थल राजघाट पर पहुंच कर पूरी कर दी। दरअसल, कांग्रेस पार्टी इस उपवास के जरिए राजनीतिक बढ़त लेना चाह रही थी, लेकिन इन दोनों घटनाओं के कारण उसे बैकफुट पर आना पड़ा। कहा जा सकता है कि चौबे गए थे छब्बे बनने, दुबे बनकर घर लौट आए।

दरअसल, भारतीय समाज में उपवास को विरोध प्रकट करने के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल किया जाता रहा है। यह हमारी सदियों पुरानी परंपरा रही है। भारतीय मनीषी उपवास को आध्यात्मिक साधना के तौर पर देखते हैं। भारतीय समाज में त्योहारों में व्रत और उपवास रखने की परंपरा काफी पुरानी है। लेकिन महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उपवास को सत्याग्रह का शक्तिशाली अस्त्र बनाकर दुनिया को एक नायाब तोहफा दिया।

उन्होंने अंग्रेजों के साथ सामाजिक-राजनीतिक मसलों को हल करने की दिशा में उपवास को अनेक बार आंशिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया। लेकिन विडम्बना है कि आज के राजनीतिक दल और उनके नेताओं की चाल, चेहरा और चरित्र छल-छद्म से भर गया है। कांग्रेस हो या भाजपा या अन्य राजनीतिक दल सभी की कथनी और करनी में फर्क है क्योंकि आज राजनीति समाज सेवा नहीं विशुद्ध रूप से व्यापार बन गई  है। इस हमाम में सभी नंगे हैं।