उद्योगपति से याराना

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस कथन का कि उन्हें उद्योगपतियों-कारोबारियों के साथ खड़े होने और दिखने में कोई आपत्ति नहीं है निश्चय ही लोग अपने अनुसार अर्थ लगाएंगे। कांग्रेस सहित कुछ दलों ने इस पर प्रश्न खड़ा भी किया है। किंतु इसमें गलत क्या है? प्रधानमंत्री ने यह तो नहीं कहा कि वह केवल उद्योगपतियों के साथ हैं।

यह भी नहीं कहा कि कोई उद्योगपति यदि भ्रष्टाचार करेगा तो उसे छोड़ देंगे। उन्होंने तो यह कहा कि जो लोग गलत काम करेंगे वे या तो देश छोड़कर भागेंगे या फिर जेल जाने के लिए मजबूर हो जाएंगे। पिछले कुछ समय से मुख्यधारा की प्रमुख पार्टयिां भी उद्योगपतियों एवं कारोबारियों के बारे में जिस तरह की अपमानजनक भाषा प्रयोग कर रहीं हैं, वह उचित नहीं हैं।

प्रधानमंत्री ने इसी पर चोट किया। यह बात कौन अस्वीकार कर सकता है कि देश के विकास में किसानों, मजदूरों, कारीगरों, सरकारी कर्मिंयों आदि के साथ उद्योगपतियों की भी भूमिका है? देश से लेकर राज्यों तक में कौन सी सरकार रही है, जिसने उद्योगपतियों को ज्यादा-से-ज्यादा उद्योग लगाने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए कदम नहीं उठाए? आधुनिक अर्थव्यवस्था में उद्योगों की महत्त्वपूर्ण भूमिका से कौन इनकार कर सकता है।

हां, अगर वे अपनी कमाई छिपाते हैं, पूरी कमाई का कर अदा नहीं करते, सरकारी विभागों को रित देकर काम निकालते है..तो उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन केवल राजनीति के लिए उनको गाली देना बिल्कुल स्वीकार्य नहीं हो सकता। अगर कोई प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, नेता या नौकरशाह देशहित में उनका उपयोग करने के लिए उनके साथ बेहतर संबंध रखता है तो इसे शक की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए।

कांग्रेस सहित कई पार्टियां मोदी सरकार को उद्योगपतियों की सरकार कहकर आलोचना करतीं रहतीं हैं। मोदी के कहने का तात्पर्य यही था कि अगर हमारी नीयत साफ है, तो फिर उद्योगपतियों-कारोबारियों के साथ दिखने में डर नहीं होना चाहिए।

वास्तव में प्रधानमंत्री ने इसके द्वारा उद्योगपतियों के बारे में देश की धारणा को तो बदलने की कोशिश की ही है, यह भी संदेश दिया है कि उनकी सरकार विकास के मामले में सही दिशा में काम करने वाले कारोबारियों के साथ है। हमारा मानना है कि अगर कोई उद्योगपति या कारोबारी गलत करता है तो उसका विरोध हो, लेकिन अनावश्यक रूप से उनको खलनायक बनाकर राजनीतिक रोटी सेंकने का रवैया खत्म होना चाहिए।