उचित मांग

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संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्दीन ने इस  महत्त्वपूर्ण वैश्विक संगठन के ढांचे और कार्यप्रणाली में सुधार करने का सुझाव दिया है, जो मौजूदा दौर की अहम जरूरत है। हालांकि लंबे समय से भारत सहित अनेक सदस्य देशों ने स्वीकार किया है कि यह  संगठन मौजूदा दौर की परिस्थितियों के अनुकूल नहीं है, बावजूद इसके महाशक्तियों के बीच अनवरत रूप से जारी सत्ता की राजनीति के कारण इसके संरचनात्मक और प्रक्रियागत ढांचे में सुधार की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई है। उन्नीस सौ पैंतालिस में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी। तब पचास देश इसके सदस्य थे, और आज करीब एक सौ नब्बे से ज्यादा देश। आज विश्व की भू-राजनीति बदल रही है।

आतंकवाद, साइबर क्राइम जैसे नये किस्म के अपराधों के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर सशस्त्र संघर्ष तेज हुआ है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के उद्देश्य से गठित इस संस्था की संरचना और कार्यप्रणाली में समय की मांग के अनुरूप सुधार नहीं हो पाया है। ऐसा ही चलता रहा तो इस  संगठन का भी वही हश्र होगा जो प्रथम विश्व युद्ध के बाद गठित राष्ट्र संघ का हुआ था।

गौरतलब है कि राष्ट्र संघ द्वितीय विश्व युद्ध रोक पाने में बुरी तरह विफल हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध के भयानक परिणामों को भुगतने के बाद संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी। बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की चुनौतियों से निपटने में यह प्रभावशाली साबित नहीं हो पा रहा है। इसीलिए भारत समेत अनेक देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने या मौजूदा स्थायी सदस्यों को प्राप्त वीटो अधिकार को समाप्त करने की मांग कर रहे हैं। लेकिन इस मुद्दे पर सभी देशों की सहमति नहीं बन पा रही।

नई दिल्ली लंबे समय से सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की मांग कर रही है, लेकिन अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, रूस और चीन जैसे पांच स्थायी सदस्यों की सत्ता राजनीति के चलते बात नहीं बन पा रही। इन पांचों देशों की जिम्मेदारी बनती है कि इस संगठन को चुनौतियों से निपटने लायक बनाने के लिए भारत समेत जर्मनी, जापान जैसे देशों को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने के लिए आगे बढ़कर पहल करें। ऐसा नहीं होता है तो संयुक्त राष्ट्र भी राष्ट्र संघ की तरह नई चुनौतियों से निपटने में निष्प्रभावी होकर रह जाएगा।