इंसाफ है फांसी

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सर्वोच्च न्यायालय ने निर्भया दुष्कर्म के अपराधियों के प्रति जो रु ख अपनाया है उसी की उम्मीद थी। न्यायालय तथ्यों के आईने में कानून के अनुसार अपना फैसला करता है। सर्वोच्च न्यायालय इस मामले में चार शेष बचे दोषियों के खिलाफ यह फैसला दे चुका था कि दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा इनको दिया गया मृत्युदंड बिल्कुल सही है।

पुनर्विचार यायिका में न्यायालय की धारणा बदल जाएगी और वह अपने पूर्व के फैसले को बदल देगा इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती थी। हालांकि हमारी न्याय व्यवस्था की यह विशेषता है कि न्यायपालिका अपने द्वारा दिए गए फैसले को भी बदलता है, लेकिन यह ऐसा मामला है जिसमें इसकी कोई गुंजाइश ही नहीं। पुनर्विचार यायिका पर फैसला देते हुए न्यायालय ने यही तो टिप्पणी की है।

उसने यह भी कहा है कि अभियुक्त जो दलीलें दे रहे हैं, वह पहले भी दे चुके हैं। उनका कोई अर्थ नहीं है। मामले की छानबीन और सुबूतों के आधार पर ही फैसला दिया गया था। वास्तव में निर्भया कांड भारत के इतिहास में ऐसा अपराध था, जिसकी तुलना किसी अन्य अपराध से की ही नहीं जा सकती। पूरे देश को उस कांड ने झकझोर दिया था। किसी के लिए यह कल्पना करना मुश्किल था कि मनुष्यों का कोई समूह किसी लड़की के साथ इस तरह की हैवानियत कर सकता है। सच तो यही है कि उस अपराध के लिए कोई शब्द या शब्द समूह का चयन आज भी कठिन है। वह केवल सामूहिक बलात्कार नहीं था।

यौन बर्बरता शब्द भी उसके सामने छोटा पड़ जाता है। किसी को मृत्युदंड दिया जाए या नहीं, इस पर दुनिया की तरह भारत में भी बहस चल रही है, लेकिन जब तक हमारे कानून में इसका प्रावधान मौजूद है न्यायालय फैसला देता रहेगा। अभियुक्तों की तरफ से यह तर्क भी दिया गया था। मृत्युदंड के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने विरलों में विरलतम मामले का स्वयं ही आधार बनाया हुआ है।

अगर यह मामला विरलों में विरलतम नहीं हो सकता तो फिर कोई नहीं हो सकता। अगर ये क्यूरेटिव याचिका डालते हैं तो भी न्यायालय अपना फैसला बदलेगा इसकी उम्मीद न के बराबर है। हम यह नहीं कहते कि इन दोषियों को फांसी पर लटका दिए जाने से निर्भया की आत्मा को शांति मिल जाएगी। हां, इस सजा से देश में यह संदेश जरूर जाएगा कि ऐसा बर्बर अपराध करने वाले मान लें कि वह अपने जीवन का अंत करने जा रहे हैं। न्याय का एक भय निवारक संदेश होता है और वह इससे निकलेगा।