आसान नहीं बच्चों की परवरिश

अभिषेक कुमार,

अब वो जमाना गया जब ज्यादातर भारतीय माता-पिता बच्चों के लालन-पालन से जुड़ी हर चिंता से तकरीबन बरी रहते थे। बच्चे दो या तीन से ज्यादा हुए तो प्राय: कहा जाता कि उन्हें पालना कोई समस्या नहीं है। जिस ऊपर वाले की दुआ से पैदा हुए हैं, उसी के आसरे पल-बढ़ जाएंगे। लेकिन संयुक्त परिवारों से टूट कर बने एकल परिवार के लिए बच्चा जिम्मेदारी के साथ आता है। खास तौर से उस देश में जहां नया मध्य वर्ग पिछले डेढ़-दो दशक में तैयार हुआ है। वहां मध्य वर्ग बच्चे को दुनिया में लाने से पहले उसकी योजना बनाता है। ऐसा इसलिए करता है ताकि कहीं बच्चे की परवरिश का खर्च उसे रास्ते पर न ला छोड़े।

ब्रिटेन के शाही परिवार में अप्रैल में तीसरे बच्चे का आगमन हुआ। शाही दंपती की तीसरी संतान होने पर वहां एक टिप्पणी आम थी कि ब्रिटेन में भी तीन बच्चे पालना सिर्फ शाही परिवार के वश की बात रह गई है। इस बच्चे के आगमन के साथ वहां सेंटर फॉर इकोनॉमिक्स एंड बिजनेस रिसर्च (सीईबीआर) ने एक सर्वेक्षण किया। पता चला कि ब्रिटेन में जन्म से लेकर 21 वर्ष की उम्र तक एक बच्चे की मूलभूत जरूरतों (खाना, कपड़ा, सामान्य जीवन शैली और शिक्षा-दीक्षा) पर खर्च 2.3 करोड़ रुपये हो गया है। तीन बच्चों की परवरिश पर यह खर्च 7 करोड़ रु पये ठहरता है, जबकि एक मध्यवर्गीय परिवार की औसत आय 30 लाख रु पये सालाना है।

सीईबीआर के मुताबिक, यह खर्च इतना ज्यादा है कि अब 21 फीसदी ब्रिटिश दंपती एक से ज्यादा बच्चे की योजना बनाने में ही कतराते हैं। ब्रिटेन में 2017 से 3 बच्चों वाले परिवारों मिलने वाली सब्सिडी भी बंद कर दी गई है, ऐसे में परवरिश का खर्च और भी बढ़ गया है। ब्रिटेन से तुलना करें तो भारतीय मध्य वर्ग की स्थितियों में कोई ज्यादा अंतर नहीं है। यहां भी कई बार प्रति बच्चा खर्च एक औसत मध्यवर्गीय परिवार की आधी आय के बराबर ठहरता है। इसमें ज्यादा बड़ा हिस्सा स्कूल की फीस, टय़ूशन और खेल की कोचिंग आदि का होता है। कई और खर्च ऐसे हैं, जिनके बारे में दो दशक पहले के अभिभावक सोचते भी नहीं थे।

यह नया खर्च इलेक्ट्रॉनिक क्रांति ने बढ़ाया है। बच्चे इंटरनेट के प्रभाव में आकर नई-नई फरमाइशें करते हैं, ऑनलाइन शॉपिंग करते हैं, हर हफ्ते-दूसरे हफ्ते महंगे सिनेमा हॉल में फिल्म देखने की मांग करते हैं, पित्जा-बर्गर आदि का सेवन करते हैं, और सेहत-फिटनेस कायम रखने के लिए अतिरिक्त खर्च की मांग रखते हैं। इस नजरिए से देखें तो ब्रिटेन की तरह भारतीय अभिभावक भी बच्चों की परवरिश पर होने वाले बेइंतहा खर्च के दबाव में हैं। इस बढ़ते खर्च की एक अहम वजह और है। आज मध्यवर्गीय परिवार में पलता-बढ़ता बच्चा अभिभावकों की अधूरी इच्छाओं और सपनों को पूरा करने का जरिया भी है। इसलिए उसकी स्कूलिंग और प्रोफेशनल ट्रेनिंग-कोचिंग आदि पर अलग से खर्च हो रहा है, जिससे शायद भारतीय अभिभावक अपने ब्रिटिश समकक्षों के मुकाबले कहीं ज्यादा दबाव में हैं।

समस्या का एक सिरा इससे भी जुड़ता है कि पारंपरिक तौर पर भारतीय मां-बाप बच्चों के जीवन और भविष्य को लेकर बेहद प्रोटेक्टिव होते हैं। इसका फायदा बच्चों को मिलता है क्योंकि पैरेंट्स अपनी आय का काफी बड़ा हिस्सा बच्चों पर खुशी-खुशी खर्च कर डालते हैं। इस कारण मां-बाप की जेब पर बेतहाशा बोझ बढ़ा है, वहीं दूसरी ओर कोचिंग संस्थानों से लेकर कॅरियर संवारने वाले ट्रेनिंग संगठनों की चांदी हो गई है, क्योंकि अपने बच्चे के भविष्य को लेकर आशंकित रहने वाले अभिभावक कोचिंग आदि पर सालाना दो-तीन लाख रु पये खर्च करने में भी नहीं हिचकते।

इसका गंभीर पक्ष यह है कि रोजगार में बढ़ते दबावों के चलते अपने दफ्तर या बिजनेस में रोजाना 15-16 घंटे लगाने वाले अभिभावक इसका आकलन तक नहीं कर पाते हैं कि बच्चे की जिस कोचिंग पर कई लाख रुपये खर्च कर रहे हैं, क्या वह उन्हें कोई विशेष ज्ञान, समझ या ट्रेनिंग दे पा रही है, या नहीं। सवाल है कि क्या पैरेंट्स समझ पाएंगे कि बच्चों की परवरिश के नाम पर ऐसा ऊलजलूल खर्च उठाने वाली उनकी मानसिकता के चलते बच्चे उन्हें मां-बाप या दोस्त न समझ कर फाइनेंसर समझने लगे हैं, और इसका फायदा बाजारू ताकतें जमकर उठा रही हैं।