आपातकाल अब और नहीं

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आपातकाल के 43 वर्ष बाद जब उस दौरान की स्थितियों को याद करते हैं तो सिहरन पैदा होती है। केन्द्र सरकार ने क्षण भर में संविधान का अपहरण कर लिया था। भारतीय नागरिकों को मिले सारे अधिकार जिनमें मौलिक अधिकार भी शामिल थे, छीन लिए गए। उस समय राजनीति एवं अन्य क्षेत्रों में सक्रिय लोग 25 जून 1975 की आधी रात को भूल नहीं सकते जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने घोषणा की कि राष्ट्रपति जी ने देश में आपातकाल लगा दिया है। कांग्रेस के पास आपातकाल के पक्ष में जितने भी तर्क रहे हों, इसकी न जरूरत थी, न कोई इसका ठोस आधार था।

केवल इस भय से कि विपक्ष देश में अशांति एवं अस्थिरता पैदा कर सकता है, आपातकाल नहीं लगाया जा सकता। उसके लिए संविधान ने जो स्थितियां दी हैं, उनमें से एक भी उपस्थित नहीं था। हां, सरकार की कई विफलताओं को लेकर आंदोलन अवश्य चल रहा था जो लोकतंत्र में स्वाभाविक है। इमरजेंसी पर काम करने वाले लोग मानते हैं कि अगर 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में इंदिरा गांधी का रायबरेली से निर्वाचन रद्द न किया होता तो आपातकाल नहीं लगता। पहली बार किसी प्रधानमंत्री का चुनाव इस आधार पर रद्द किया गया था कि व्यापक पैमाने पर कदाचार हुआ है।

इंदिरा गांधी कुर्सी छोड़ने के लिए तैयार नहीं थीं। विपक्ष का सड़कों पर उतरना स्वाभाविक था। इसका जवाब कानूनी और राजनीतिक हो सकता था। पर मिला लोकतंत्र विरोधी आपातकाल। संविधान में संशोधन कर लोक सभा का कार्यकाल पांच के बजाय सात वर्ष कर दिया गया। प्रधानमंत्री के निर्वाचन को रद्द नहीं किया जा सकता। ये सारे अलोकतांत्रिक संशोधन थे।

समाचार पत्रों-पत्रिकाओं पर सेंशरशिप लागू हो गया। संबंधित अधिकारियों की अनुमति के बिना कोई समाचार या लेख प्रकाशित नहीं हो सकता था। जनता की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली गई। रातों-रात विपक्षी नेता जेल में डाल दिए गए। देश और संसद विपक्षविहीन हो गया। क्या आज हम उस प्रकार की तानाशाही शासन स्वीकार कर सकते हैं?

आपातकाल को याद करते हुए केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि उसे एक दु:स्वप्न की तरह भूल जाएं, बल्कि संकल्प लें कि संविधान में दिए गए अधिकारों के प्रति हम इतने सजग रहेंगे कि कोई हम पर इमरजेंसी न थोप सके।