आपकी हर बात रिकार्ड करता है आपका स्मार्टफोन!

(एजेंसी), लंदन

आपको पागल नहीं बनाया जा रहा, यह जानकारी बिलकुल सच है कि आपका स्मार्टफोन आपकी हर बात को सुनता ह और रिकार्ड करता है। साइबर सिक्योरिटी के विशेषज्ञों ने इस बारे में चेताया है। अनेक वर्षो से स्मार्ट फोन के उपभोक्ता यह शिकायत करते रहे हैं कि उन्हें ऐसा लगता है उनका फोन उनकी हर बात को सुन रहा है चाहे वह आपकी जेब में ही क्यों पड़ा  हो। कई लोगों ने इन बातों को शेयर किया है कि वह जब किसी उत्पाद के बारे में बातें कर रहे होते हैं या किसी दोस्त से छुट्टी पर जाने के किसी स्थान के बारे में बात कर रहे होते हैं तो उन्होंने पाया कि उनके फोन के सोशल मीडिया एप्स में इस बारे में विज्ञापन आने लगते हैं। यह मात्र संयोग नहीं  है।

हालांकि अभी तक पता नहीं चल पाया है कि यह टेक्नोलॉजी किस बात से ट्रिगर होती है या शुरू होती है लेकिन आपके मोबाइल में शामिल एप्स के एंड यूजर एग्रीमेंट में इसका पूरा इंतजाम होता है। आज के जमाने के अधिकांश मोबाइल के मॉडल ध्वनियों के उपयोग से चलने वाले हैं।कुछ शब्द सुनते ही एप्लीकेशन शुरू हो जाता है जैसे सर,  ओके या गूगल। आपका स्मार्टफोन इन शब्दों को सुनने के लिए हमेशा तत्पर रहता है और इनके सुने जाते ही शुरू हो जाता है।

एक अनुसंधानकर्ता का कहना है कि आपके द्वारा बोले गए वाक्य या प्रचलित शब्द थर्ड पार्टी ऐप के द्वारा सोशल मीडिया पर  विज्ञापनदाताओं तक पहुंच सकते हैं जैसे कि ट्विटर या  इंस्टाग्राम पर लेकिन ऐसा तभी होगा जब उन्होंने इस बारे में पूर्व अनुमति ली हो। इसका मतलब यह हुआ कि जब किसी नई जींस के बारे में या किसी छुट्टी की योजना के बारे में बातें होती हैं तो यह ऐप आपकी टाइमलाइन को विज्ञापनदाताओं तक पहुंचा कर आपको विज्ञापन देना शुरु कर देते हैं।

साइबर सुरक्षा की मशहूर फर्म एस्टेरिक  के वरिष्ठ सुरक्षा सलाहकार डॉक्टर पीटर हैनमैन कहते हैं कि स्मार्टफोन के माइक्रोफोन नियमित रूप से इस बारे में सक्रिय रहते हैं। वह कहते हैं कि फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसी कंपनियां हजारों हजार ट्रिगर्स तैयार करती हैं जोकि इस प्रक्रिया को चालू कर सकते हैं और विज्ञापनदाताओं को आप तक पहुंचने का मौका दे सकते हैं। मान लीजिए कि दो लोग खाने की चीजों में बात करते हैं तो यह टेक्नोलॉजी शुरू हो सकती है। हैनमैन कहते हैं गूगल इस बारे में काफी खुला है और उन्हें लगता है कि अन्य कंपनियां भी ऐसा ही करती होंगी। यह मार्केटिंग के दृष्टिकोण से काफी खुला मामला है और वह अपने एंड यूजर एग्रीमेंट में इसका पूरा-पूरा इंतजाम  रखते हैं कि उपभोक्ता  उन्हें इसकी अनुमति दे दें।
    
कंपनियां अत्याधुनिक तरीके अपना रही हैं और विज्ञापन अधिकाधिक पर्सनल होते जा रहे हैं। विभिन्न एप उपभोक्ताओं की ऑनलाइन एक्टिविटी के बारे में जानते रहते हैं और विज्ञापनदाताओं को सूचना पहुंचाते रहते हैं । यह प्रक्रिया अवैधानिक नहीं है क्योंकि 1998 के डाटा प्रोटेक्शन एक्ट के तहत एक व्यक्ति इस बात की पूरी सहमति देता है कि उसका डेटा एकत्र किया जाए और उसका विज्ञापन के लिए उपयोग किया जाए।  हालांकि गूगल, फेसबुक या ट्विटर  इस बात को नहीं मानते कि वह कोई सूचना विज्ञापनदाताओं को देते हैं।

फेसबुक जैसी कंपनी लगातार इस बात से इंकार करती है कि वह किसी की निजी बातचीत एकत्र करते हैं और उसे वाणिज्यिक उपयोग में लाते हैं लेकिन विशेषज्ञों का कहना है तकनीक संवादों को सुनती रहती हैं जिसमें आज के जीवन में बार-बार दोहराए जाने वाले शब्द  एकत्र किए जाते हैं और उनका उपयोग विज्ञापनदाताओं के लिए किया जाता है हालांकि अभी तक यह बात पूरी तरह साबित नहीं हुई है लेकिन दाल में काला है यह तो तय हो चुका है।