आदमखोर भीड़

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महाराष्ट्र के धुले जिले के राइनपाड़ा गांव के निवासियों ने पांच निर्दोष युवकों को जिस बेरहमी से लाठी-डंडों से पीट-पीट कर मार डाला वह रोंगटे खड़ी करने वाला है। खबरों के अनुसार मारे गए युवक एक बस से उस गांव में उतरे थे। वहां से कहीं जाने के लिए उन्होंने एक बच्चे से रास्ता पूछा। बस, क्या था। किसी ने कह दिया ये बच्चा चोर हैं और लोगों ने उन पर हमला कर दिया।

उनके अनुनय-विनय का उन्मादित भीड़ पर कोई असर नहीं हुआ। पुलिस ने अभी तक इस अपराध के लिए 10 लोगों को गिरफ्तार किया है। हो सकता है उनको सजा भी मिल जाए। किंतु इससे जो मर गए न वे वापस आ सकते हैं न जिन परिवारों पर पहाड़ टूट पड़ा उनका दुख कम हो सकता है। अपने किस्म की यह कोई पहली घटना भी नहीं है। भीड़ द्वारा महज अफवाह पर भयावह हिंसा को अंजाम देने की घटनाएं हर एक अंतराल पर घटती रहतीं हैं। महाराष्ट्र में इस समय सोशल मीडिया पर बच्चा चोरों और गुर्दा चोरी की अफवाह बुरी तरह फैली हुई है। सरकार ने कई बार इसका खंडन किया, लेकिन अफवाह खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। 21 जून को गोंदिया जिले में गुर्दा चोर होने के संदेह में एक भिखारी की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी। घटना का वीडियो सामने आने पर 25 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ।

इससे पहले 15 जून को औरंगाबाद में किराए का मकान खोज रही महिला को बच्चा चोर समझकर भीड़ ने पीटकर अधमरा कर दिया। 6 जून को भी नांदेड़ जिले में काम के लिए आए चार लोगों पर बच्चा चोर समझकर हमला हुआ था, लेकिन वे बच गए। यह किस तरह के समाज का लक्षण है? किसी पर हमला करने से पहले हम सच्चाई को समझने की कोशिश क्यों नहीं करते? वैसे अगर कोई अपराधी हो तब भी उसे मार डालने या उस पर हमला करने का हमें अधिकार नहीं। एक सभ्य समाज का लक्षण यही है कि हम पुलिस को इसकी सूचना दें और कानून को अपना काम करने दें।

अगर इतना भर विवेक समाज के अंदर पैदा हो जाए तो ऐसी घटनाएं नहीं होंगी। भारतीय समाज में इतनी हिंसा और उतावलापन की विकृति कहां से आ गई, इस पर अवश्य विचार होना चाहिए। ये घटनाएं बता रहीं हैं कि समाज ऐसे मामलों में विवेकशील आचरण करे इसके लिए व्यापक पैमाने पर जन जागरण एवं अन्य अभियान चलाने की आवश्यकता है।