आतंकवाद का एनकाउंटर

,

करीब एक महीने बाद सेना, अर्धसैनिक बल और जम्मू-कश्मीर पुलिस के संयुक्त अभियान ने घाटी में सक्रिय आतंकवादियों को भारी क्षति पहुंचाई है। पिछले दो दिनों में सुरक्षा बलों ने श्रीनगर के छत्ताबल में तीन आतंकवादियों को और दूसरे दिन शोपियां जिले में हिजबुल मुजाहिदीन के शीर्ष कमांडर और हाल में भर्ती हुए एक आतंकवादी समेत पांच आतंकवादियों को मार गिराया।

मारे गये आतंकवादियों में हिज्बुल मुजाहिदीन का शीर्ष कमांडर सद्दाम पैडर और एक कश्मीर विविद्यालय का प्रोफेसर मोहम्मद रफी भट शामिल है। संयुक्त ऑपरेशन के दौरान आतंकवादियों को भगाने के लिए पत्थरबाजी करने वाले पांच नागरिक भी मारे गए। इससे पहले 1 अप्रैल को दक्षिण कश्मीर में सेना और बाकी फोर्सेस के ऑपरेशन में 13 आतंकवादियों को मौत के घाट उतारा गया था।

उस दौरान भी पत्थरबाजी करने के दौरान चार नागरिकों की मौत हो गई थी। ये आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं कि घाटी में हालात सुधरे नहीं हैं। रह-रहकर आतंकवादी और स्थानीय युवा सुरक्षा बलों के खिलाफ सिर उठाते रहे हैं। खासकर राज्य के दक्षिणी भाग में हालात ज्यादा चिंताजनक हैं। पत्थरबाजी और सुरक्षाबलों पर सबसे ज्यादा हमले इन्हीं इलाकों में होते हैं।

हालांकि सरकार यह दलील देती है कि आतंकवादी घटानाओं में हाल के महीनों में कमी आई है, मगर इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि युवाओं में आतंकवाद की राह पकड़ने का विचार ज्यादा तेजी से पनपा है? यहां तक कि पढ़े-लिखे लोग भी हाथों में बंदूक थाम रहे हैं। केंद्रीय गृह मंत्रायल के आकंड़ों के मुताबिक आतंकवादी बुरहान बानी की मौत (जुलाई 2016) के बाद घाटी में आतंकियों की तादाद में 55 फीसद का इजाफा हुआ है। 2010 के बाद 2016 में सबसे अधिक तादाद में युवकों ने आतंक की राह पकड़ी। और स्थानीय युवकों में यह मानसिकता अभी भी बनी हुई है।

सरकार और सेना को इस मसले का हल हर कीमत पर निकालना होगा। यानी कि उनका भरोसा जीतना होगा। वहां के युवाओं को राजनीतिक बातचीत में शामिल करना होगा। युवाओं को उकसाकर सुरक्षाबलों पर हमले कराने की पाकिस्तान की साजिश को जमींदोज करना होगा। और यह तभी होगा, जब स्थानीय प्रशासन उनसे संवाद बढ़ाएगी। आतंकवाद एक दिन में खत्म नहीं होने वाला। इसके लिए संजीदगी और समझदारी से कदम बढ़ाने होंगे। कश्मीर में अमन का अर्थ देश की शांति है।