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संगीन अपराधों में लिप्त लोगों के खिलाफ आरोप तय होने पर उन्हें चुनाव लड़ने से रोकने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने से पहले किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने से रोकना कठिन होगा।

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने इस मसले पर चुनाव आयोग, केंद्र सरकार समेत सभी पक्षों की दलीलें पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया  है। इसका आशय यह है कि राजनीतिक दल आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे  व्यक्तियों को टिकट और अपना चुनाव चिह्न आवंटित नहीं करते हैं, फिर भी वे स्वतंत्र चुनाव तो लड़ ही सकते हैं।

हालांकि उसके जीतने की संभावना बहुत कम रहेगी। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण सवाल तो यह है कि क्या इस मसले पर राजनीतिक दलों के बीच सहमति बन पाएगी? अगर ऐसा संभव होता तो चुनाव आयोग, जागरूक गैर-सरकारी संगठन और सुप्रीम कोर्ट पिछले तीस वर्षो से राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए जूझते नहीं रहते।

दरअसल, राजनीति के अपराधीकरण को रोकने की जितनी जिम्मेदारी चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की है, उससे कहीं ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी राजनीतिक दलों की है। अगर राजनीति के अपराधीकरण पर पूरी तरह अंकुश लगाने के मसले पर ये तीनों एकमत हो जाते हैं, तो इसमें शक की कोई गुंजाइश ही नहीं है कि राजनीतिक व्यवस्था स्वच्छ न रह पाए। इसलिए राजनीतिक दलों को जीत सुनिश्चित करने के अपने लालच से ऊपर उठना होगा।

वरना सुप्रीम कोर्ट या चुनाव आयोग चाहे जितनी कोशिशें कर लें, राजनीतिक दल कोई न कोई चोर दरवाजा तलाश लेंगे। दरअसल, अपराधी किस्म का व्यक्ति राजनीतिक दलों के लिए ज्यादा मुफीद होता है, क्योंकि चुनाव जीतने में वह हर तरह की मदद करता है। इसलिए राजनीतिक दल राजनीति में अपराधियों का इस्तेमाल न करने के प्रति अपनी दृढ़ता नहीं दिखाते। राजनीतिक अपराधीकरण से जुड़ा एक और महत्त्वपूर्ण पहलू है, जो कम गंभीर नहीं है।

सरकार की नीतियों के विरोध प्रदर्शन के दौरान राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर अनेक मुकदमे दर्ज हो जाते हैं। इसलिए राजनीति में अपराधीकरण को रोकने के लिए कानून से ज्यादा नैतिकता की जरूरत है। क्या हमारे राजनीतिक दल इस दिशा में कोई पहल करेंगे।