असली वजह क्या?

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प्राकृतिक आपदा के मोर्चे पर दक्षिणी राज्य केरल बुरी तरह से जूझ रहा है। ऐसा लगता है कि कुदरत यहां सबकुछ तबाह करने पर आमादा है। वह इंसानों से बदला लेना चाहती है या ले रही है। और ऐसा सोचने के पीछे कई कारक हैं। प्रकृति हमेशा अपना रौद्र रूप नहीं दिखाती है।

जब उस पर आघात होता है या उसके नैसर्गिक रूप को बेदर्दी और बेरहमी से इस्तेमाल किया जाता है, तभी वह कहर बनकर टूटती है। हमें इस बात को संजीदगी से और गहाराई तक समझने की जरूरत है कि सबसे खूबसूरत राज्य में प्रकृति ने इतना डरावना रुख क्यों अख्तियार कर लिया? आखिर क्यों बारिश और उसके बाद बाढ़ ने हर चीज को लील लेने की ठान ली?

हमें सबसे पहले इसकी वजह को तलाशना होगा और फिर इसके निदान के लिए ठोस उपाय करने होंगे। इस बात को केरल की सरकार से भला बेहतर और कौन जान सकता है कि वहां नियम-कानून को ताक पर रखकर बेतरतीब निर्माण कार्यों को मंजूरी दी गई या उसे सरकारी संरक्षण हासिल हुआ। वनों से घिरा रहने वाला राज्य आज की तारीख में इस कमी से दो-चार है। वहां वर्षो से पहाड़ों का सीना चाक किया जाता रहा है।

पश्चिमी घाट का वनों से आच्छादित इलाका आज कमजोर हो चुका है। पहाड़ों को काटा गया है और नदियों का अवैध खनन होने दिया गया। यानी केरल की विभीषिका को जिस रूप में प्रकृति जनित बताया जा रहा दरअसल वैसा बिलकुल भी नहीं है। इकोलॉजिकल सेंसेटिव जोन में निर्माण कार्य की मनाही है, मगर यहां इसके उलट हुआ। और यह धतकर्म बरसों से जारी है। 2010 में इस मामले पर गठित गाडगिल कमेटी ने इस तरफ ध्यान भी आकृष्ट कराया था। मगर किसी ने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया। ठीक है कि इस बार प्रदेश में बारिश पुरजोर हुई है, मगर यह अप्रत्याशित नहीं है। यानी कि सरकार के लिए अब उठ खड़ा होने का वक्त आ गया है।

सरकार को उन सिफारिशों पर सख्ती से अमल करने का मन बनाना ही होगा, जिस खतरे की बात विशेषज्ञ कमिटी ने है। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि जब-जब प्रकृति से छेड़छाड़ हुई है या उसके मूल रूप को बदलने का कुप्रयास हुआ है, तब-तब इंसानों के लिए खतरा बढ़ा है। फिलवक्त तो राज्य की जनता को बचाने और पीड़ित जनता को सुरक्षित इलाकों में पहुंचाने का वक्त है। किंतु इसके बाद केरल की सरकार को मानव निर्मित आपदा के मसले पर ज्यादा समझदारी से सोचना होगा।