अलविदा करुणानिधि

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मुथुवेल करुणानिधि का जाना तमिलनाडु की राजनीति में एक युग का अंत तो है ही केन्द्रीय राजनीति के लिए भी एक रिक्तता है। वे भारत के अकेले ऐसे नेता थे जो लगातार साढ़े छ: दशक से ज्यादा समय तक सत्ता की राजनीति से जुड़े रहे। कभी चुनाव न हारने वाले करुणानिधि एक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते थे।

नुक्कड़ नाटकों, हाथ से लिखे अखबार के माध्यम से राजनीति में आने वाले करुणानिधि ने अपना राजनीतिक सफर हिन्दी विरोध से आरंभ किया और अंत तक वे इस विचार से विलग नहीं हुए। यह अलग बात है कि हाल के वर्षो में हिन्दी विरोध का उनका कोई ऐसा बयान नहीं आया जिसकी उत्तर भारत में तीखी प्रतिक्रिया हो।

नाटक तथा फिल्मी पटकथा लेखक होने का मतलब भाषा पर उनकी गहरी पकड़ थी, जिसका लाभ उन्हें राजनीति में मिला। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के वे संस्थापक सदस्यों में से थे और सीएन अन्नादुरई की मौत के बाद से लेकर अपनी मौत तक वे तमिलनाडु राजनीति के एक प्रमुख स्तंभ बने रहे। यहां तक कि एमजी रामचन्द्रन जब तक उनके साथ रहे वे समानांतर नेता नहीं बन सके।

द्रविड़ आंदोलन को धार देने तथा नास्तिक दशर्न को जीवन और राजनीति में अपनाने वाले वे ऐसे नेता थे जिसकी तुलना दूसरे किसी से हो ही नहीं सकती। श्रीलंका में तमिलों की लड़ाई को खुलेआम समर्थन तथा वहां से भागे तमिलों को शरण देकर उन्होंने दुनिया भर के तमिलों के बीच स्वयं को लोकप्रिय बनाया। लिट्टे का समर्थन भी उन्होंने खुलेआम किया तथा प्रभाकरण से अपनी दोस्ती को कभी छिपाया नहीं। विखंडित राजनीति का दौर आंरभ होने के बाद 1989 से ही केन्द्रीय राजनीति में उनकी भूमिका आरंभ हुई जो अंत तक जारी रही।

ऐसे व्यक्तित्व के जाने के असर से उबरना प्रदेश की राजनीति के लिए आसान नहीं होगा। दिसम्बर में 2016 में जे. जयललिता एवं उसके बाद करुणानिधि की मृत्यु से प्रदेश की राजनीति में ऐसी रिक्तता आई है, जिसको भरने वाला इस समय कोई व्यक्तित्व नजर नहीं आता। पिछले ढाई दशकों की तमिलनाडु की राजनीति इन दो व्यक्तित्वों के ईर्द-गिर्द ही सिमटी रही।

इन दोनों के जाने के बाद इनकी पार्टयिों में ही कोई ऐसा चेहरा नहीं, जिसे जनता के बीच वैसी लोकप्रियता प्राप्त हो। जो व्यक्तित्व हाल में राजनीति में आए हैं, उनमें से कोई ऐसा नहीं जिसकी ऐसे में तमिलनाडु की राजनीति में एक नए दौर की शुरु आत हो सकती है।