अलविदा अटल

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अटल बिहारी वाजपेयी का जाना सही अथरे में एक युगांत है। भारतीय लोकतंत्र ने जो भी गिने-चुने कद्दावर राजनेता पैदा किये हैं, अटल जी उनमें से शीर्ष स्थान पर रखे जा सकते हैं। भाजपा के शायद वह एकमात्र ऐसे नेता थे, जिन्हें ‘अजातशत्रु’ कहा जा सकता है। उन्हें जितना सम्मान अपनी पार्टी में प्राप्त था, उसके कहीं ज्यादा दूसरी पार्टियों के नेता उनका सम्मान करते थे। वह जब संसद में बोलने के लिए खड़े होते थे तो सभी राजनीतिक दलों के नेता उनके भाषणों को सुना करते थे। पार्टी से परे जा कर सम्मान प्राप्त करने के इस दुर्लभ गुणों के कारण ही वह भाजपा को स्वीकार्य और सार्वजनिक स्वरूप दे सके।

उनके नेतृत्व में भाजपा का हिंदुत्व विनम्र और समन्वयवादी हुआ था। इसी के चलते भाजपा के अंदर नम्रता और लचीलापन आया जिससे कि भाजपा का गठबंधन हो सका। यह लचीलापन आज की राजनीति का अपरिहार्य गुण बन गया है। अटल जी को गठबंधन की व्यवहारवादी राजनीति का वास्तविक सूत्रधार कहा जा सकता है। उनके नेतृत्व में ही पहली बार भाजपा में यह आत्मविश्वास पैदा हुआ कि वह कांग्रेस का विकल्प बन सकती है। अपनी कट्टर और साम्प्रदायिक छवि के कारण भाजपा अछूत बनी हुई थी। अटल जी की अगुवाई में ही भाजपा का अछूतोद्धार हुआ। इसमें उनकी ईट दर ईट बनी राष्ट्रीय और बहुलतावादी छवि काम आई।

वह पहले गैर कांग्रेसी विदेश मंत्री थे, जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र में हिंदी बोल कर भारत की धाक जमा दी थी। फिर प्रधानमंत्री के रूप में पोखरण में परमाणु विस्फोट कर भारत की सुरक्षा में आत्मनिर्भता का एक तरह डंका बजा दिया। प्रतिबंध से होने वाले नुकसान के आगे घुटने नहीं टेके। बहुलतावादी भारत के साथ संयुक्त परिवार के उदारवादी दृष्टिकोण से पेश आने की काबिलियत ने उन्हें अपनी पार्टी और गठबंधन में औरों से अधिक प्रतिबद्ध लोकतांत्रिक, खांटी धर्मनिरपेक्ष और विशिष्ट बनाया। जनसंघ की हिंदूवादी सैद्धांतिकी में दीक्षित होकर भी उन्होंने भारत की विविधता की अक्षुण्णता के बड़े आग्रही पंडित नेहरू के विजन से ज्यादा तादात्म्य पाया।

नेहरू ने सही ही अटल में ‘भारत का भावी नेतृत्व’ देखा था। आर्थिक उदारीकरण का दूसरा चरण अटल ने पूरा किया। अटल ने विनिवेश मंत्रालय के साथ स्वर्णचतुर्भुज उच्च पथों की बुनियाद रखी और कश्मीर से कन्याकुमारी तक के सड़क सम्पर्क में देश का विकास देखा। विदेशों में तेल कूपे की नीलामी की दूरदर्शिता का कायल चीन भी हुआ। राजधर्म-निर्वहन के साथ विरोध का आदर करने वाले राजनेता के रूप में वे याद रहेंगे।