अर्थव्यवस्था : बीमार का हाल नहीं अच्छा

अरविन्द मोहन,

कुछ अजीब हो रहा है कि सारी चर्चा या तो सीधे विकास की होती है, या फिर आर्थिक कामकाज के हर पक्ष की राजनीति की। आर्थिक मोर्चे पर कहीं से अच्छी खबर नहीं आ रही है, अमेरिका-चीन की टकराहट से पाइपलाइन बिछाने के बाद भी हमारे लिए ईरान से तेल लेना मुश्किल हो रहा है, औद्योगिक उत्पादन अस्थिर है, रुपये की सांस फूल रही है, पर शेयर बाजार रोज नये रिकॉर्ड बना रहा है। जिस बैंकिंग सेक्टर की हालत खराब है, उसके भी शेयर उछल रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश या एनसीआर में आर्थिक कामकाज की रफ्तार बढ़ना उससे जुड़ी सच्चाइयों पर चर्चा नहीं कराता, बल्कि एक कंपनी द्वारा अपनी क्षमता का विस्तार करने की खबर के साथ एक ट्रिलियन डॉलर के निवेश और फिर उत्तर प्रदेश के उत्तम प्रदेश या स्वर्ग बनने की खबर ही आती है। चर्चा नहीं होती कि जिस इलाके में न कोई खनिज है, न जमीन उद्योग लगाने लायक, न बाजार है वहां क्यों सबसे तेज आर्थिक विकास है। यह चर्चा तो हमारा नेता वर्ग कभी नहीं करता कि एनसीआर न होता तो हिन्दी पट्टी के आर्थिक विकास का क्या होता क्योंकि कानपुर से लेकर रोहतास, ग्वालियर से रीवा-सतना तक के सारे पुराने कारखाने कहां गए, इसका हिसाब किसी एक पास नहीं है।
खैर, सरकार, वित्त मंत्रालय और राजनेता भले चारों तरफ से आ रहीं आर्थिक बेचैनी वाली खबरों का महत्त्व नहीं समझ रहे हों पर रिजर्व बैंक गंभीरता को समझ रहा है। तभी उसने मुद्रास्फीति की दरों में उठान देखकर भी लगातार दूसरी बार इंटर-बैंकिंग लेन देन के चार्ज बढ़ाए हैं। रिपो रेट बढ़ने का असर बैंकों की जमा दरों और ऋण की दरों पर दिखने लगा है, जो काफी समय बाद उठान पर हैं। बैंकों को पैसा अपने पास रखने के निर्देश भी हैं। एनपीए से परेशान बैंक अर्थव्यवस्था का बोझ उठाने के बजाय अर्थव्यवस्था पर बोझ बन गए हैं। खाताधारकों के लिए भी चिंता का कारण हैं। उनकी तरफ से बाजार में कम पूंजी आना नये निवेश के साथ उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री को भी प्रभावित करता है। एक जमाने में खासकर 2011 के बाद अर्थव्यवस्था में हाहाकार मचवाने में बैंकों द्वारा सूद की दरें न कम करने का योगदान भी था।
बैंक तो हवा का रुख देखकर अपने खिड़की-दरवाजे बंद करने में जुट गए हैं पर सरकार और आर्थिक राजनय में इस बात की कोई चिंता नहीं दिखती। चीन और अमेरिका के बीच जिस तरह की व्यावसायिक तनातनी है, उससे तेल की कीमतों से लेकर हर चीज में खतरा है। दक्षिण कोरिया की मोबाइल कंपनी भारत प्रेम और हमारे यहां व्यवसाय करने की आजादी से प्रेरित होकर नहीं आई है। इस बड़ी अंतरराष्ट्रीय लड़ाई में पिस कर भागी है। हमारा भी सिले-सिलाए वस्त्रों का कारोबार प्रभावित हुआ है। अभी तक हमारे लिए गनीमत यही है कि सोने और जवाहरात के हमारे आयात में कमी आई है। जवाहरात का काफी बड़ा हिस्सा गहनों में लगकर वापस निर्यात होता है पर सोना कम आना भी महत्त्वपूर्ण है। लेकिन कुल विदेश व्यापार रिकॉर्ड घाटे की तरफ जा रहा है। पिछले महीने 27 महीने का सर्वाधिक घाटा रिकॉर्ड किया गया। अंदेशा जताया जा रहा है कि लगातार सातवी तिमाही में घाटा बढ़ेगा।
जाहिरन विदेश व्यापार में घाटा सबसे ज्यादा पेट्रोलियम आयात से बढ़ा है जबकि कीमतें अभी भी मनमोहन राज वाले स्तर तक नहीं गई हैं, बल्कि चालीस फीसद तक कम हैं। पर हम ईरान से सस्ता और सुविधाजनक तेल खरीदना इसलिए छोड़ रहे हैं कि अमेरिका ऐसा चाहता है। खाड़ी के देशों से भी अलग दर पर तेल मिलना बीते जमाने की बात हो चुकी है। तेल उत्पादन में भी हमारी अपनी भागीदारी पचास से गिरकर बीस फीसद से भी नीचे चली गई है, और कहीं चर्चा नहीं होती। इसका पहला कारण तो यही है कि तेल आयात सरकार और सरकारी तेल कंपनियों के साथ ही हमारी निजी तेल कंपनियों के लिए कमाई का खेल बन गया है। कोई भी तेल की खपत घटाने, स्वदेशी तेल का हिस्सा बढ़ाने या तेल पर कर कम करने की बात नहीं करता। सो, तेल का खेल देश और उपभोक्ताओं के लिए भारी पड़ रहा है। एक मोटा अनुमान है कि तेल की कीमतें गिरने और उसका लाभ ग्राहकों तक न आने देकर सरकार हर साल पौने दो से दो लाख करोड़ रु पये का अतिरिक्त राजस्व वसूल रही है। फिर सरकार क्यों स्वदेशी उत्पादन और कम आयात की पैरवी करेगी। ऐसे में उज्ज्वला या अन्य लोक-लुभावन कार्यक्रमों पर खर्चने की सहूलियत मिल जाती है।
पर आर्थिक मामलों में सरकार के ही हाथ में सब कुछ नहीं है। होता तो वह जरूर डॉलर के मुकाबले रु पये की कीमत को थामने की कोशिश करती। डॉलर के रेट बढ़ने से उसे तेल की तरह का अप्रत्यक्ष लाभ नहीं हो रहा है। अकेले तेल के खेल में ही गिरते रुपये की वजह से लाखों करोड़ का घाटा हो गया होगा। चुनाव के समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रु पये-डॉलर के खेल पर सचेत थे। उन्होंने कहा भी था कि डॉलर का मोल चालीस रु पये से ऊपर न जाने देंगे। पर जब डॉलर सत्तर को छू रहा है, तब मोदी या उनके मंत्री भूल से भी डॉलर का नाम नहीं लेते। अमेरिकी फेडरल बैंक द्वारा सूद की दरें बढ़ाना दुनिया भर से पूंजी को अमेरिका की तरफ आकर्षित करने का कारण बना है, तो चीन से व्यावसायिक तनातनी से दुनिया भर में डर का माहौल गहरा रहा है। डॉलर को सुरक्षित करेंसी मान कर भी उसमें निवेश हो रहा है। और मांग बढ़ने से डॉलर महंगा हुआ जा रहा है। कायदे से डॉलर की गिरावट से हमारे निर्यात को लाभ हो सकता था। पर हीरे-जवाहरात की घटती मांग और सिले-सिलाए वस्त्रों के निर्यात में भी हम मात खा रहे हैं। इन दोनों क्षेत्रों पर नोटबंदी और जीएसटी की मार बहुत गलत समय में पड़ी। जब दुनिया का बाजार उभर रहा था, और हमारी अर्थव्यवस्था भी उत्साह में आ रही थी, तब इन दो फैसलों ने हमें कई कदम पीछे कर दिया। अब जीएसटी की वसूली तो व्यवस्थित होकर सरकारी राजस्व का हिसाब ठीक करने लगी है, पर एक निर्णायक वक्त पर उठे गलत कदम ने दीर्घकालिक नुकसान कर दिया है।
अगर हमारे करखनिया उत्पादन का हाल ठीक होता तो शायद हम एक और उठान की तरफ बढ़ सकते थे क्योंकि बिजली, सड़क और संरचना क्षेत्र की सामान्य स्थिति ठीक है। पर मेक इन इंडिया और स्टार्टअप समेत सभी नई योजनाएं सिर्फ  घोषणा के स्तर तक रहीं। बहुत आगे नहीं बढ़ीं, बल्कि ले देकर खेती अलाभकर होने पर भी रोजगार देने से लेकर उत्पादन और अर्थव्यवस्था में योगदान दे रही है। पर दिन ब दिन इसके अलाभकर होने से खेतिहर समाज परेशान है। और सरकार अगर सचमुच दो जमातों से डरती है, तो वह किसान और नौजवान ही हैं, जिन्होंने सालाना दो करोड़ रोजगार की उम्मीद में यह सरकार बनवाई थी।