अमेरिका बनाम ईरान

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अमेरिका द्वारा ईरान के साथ हुए अंतरराष्ट्रीय नाभिकीय समझौते से अलग होने की घोषणा से पूरी दुनिया में हलचल मच गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बराक ओबामा काल में हुए इस समझौते की लगातार आलोचना करते रहे हैं।

उनका यह भी आरोप रहा है कि ईरान ने इसका लाभ उठाकर अपनी आर्थिक स्थिति तो ठीक की लेकिन नाभिकीय हथियार बनाना बंद नहीं किया। बावजूद इसके, जिस तरह उनके यूरोपीय मित्र देश समझौते से अलग न होने का अनुरोध कर रहे थे उससे ऐसा लग रहा था कि वो तत्काल ऐसा नहीं करेंगे।

जुलाई 2015 में ओबामा प्रशासन के समय अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, चीन, फ्रांस और जर्मनी और यूरोपीय संघ के साथ मिलकर ईरान ने यह समझौता किया था।

समझौते के अनुसार ईरान को अपने संवर्धित यूरेनियम के भंडार को कम करना था और अपने नाभिकीय संयंत्रों को निगरानी के लिए खोलना था। समझौते के अनुसार ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में आंशिक रियायत दी गई थी। जाहिर है, समझौते से अलग होने के बाद ईरान पर फिर से आर्थिक प्रतिबंध लागू हो जाएगा।

हालांकि अमेरिका ने कहा है कि इन प्रतिबंधों को तुरंत नहीं लगाया जाएगा, बल्कि इसके लिए 90 और 180 दिन की प्रतीक्षा की जाएगी। उन्हीं उद्योगों पर प्रतिबंध लगाए जाएंगे, जिनकी चर्चा 2015 समझौते में की गई थी। इनमें ईरान का तेल सेक्टर, विमान निर्यात, कीमती धातु का व्यापार और ईरानी सरकार के अमेरिकी डॉलर खरीदने की कोशिशें शामिल हैं।

ट्रंप ने साफ किया कि जो भी ईरान की मदद करेगा, उन्हें भी प्रतिबंध झेलना पड़ेगा। साफ है कि इस फैसले का प्रभाव केवल ईरान पर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ेगा। ईरान के राष्ट्रपति ने कहा है कि अमेरिका के इस फैसले के बावजूद उनकी सरकार विश्व शक्तियों के साथ नाभिकीय समझौते के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन यह भी कह दिया है कि वे यूरेनियम संवर्धन को फिर से शुरू करने के लिए भी तैयार हैं।

अमेरिका के इस कदम का ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी ने समर्थन नहीं किया है। रूस और चीन द्वारा समर्थन करने का तो प्रश्न ही नहीं है। यानी अमेरिका के इस कदम को विश्व समुदाय का समर्थन मिलना मुश्किल है। हमारा मानना है कि ब्रिटेन, फ्रांस एवं जर्मनी ट्रंप को मनाने की कोशिश करें और ईरान भी यह विश्वास दिलाए कि वह किसी सूरत में नाभिकीय हथियार नहीं बनाएगा।