अभी संभव नहीं

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भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने देश में लोक सभा और विधानसभा चुनाव साथ-साथ कराने के विचार का समर्थन करके इस ज्वलंत राष्ट्रीय मुद्दे को एक बार फिर बहस के केंद्र में ला दिया है। उन्होंने विधि आयोग के अध्यक्ष बलवीर चौहान को इस आशय का पत्र लिखा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लम्बे समय से ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के पक्ष में देश का जनमत बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि कुछ विपक्षी दल यह दलील देते हुए इस विचार को खारिज कर रहे हैं कि इससे देश की संघीय शासन का स्वरूप कमजोर होगा।

वास्तव में यह दलील आधारहीन ही नहीं, राजनीति-प्रेरित भी है; जैसा कि भाजपा अध्यक्ष भी कह रहे हैं। एक राष्ट्र, एक चुनाव के विचार से असहमत होने का कोई कारण नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि इस मुद्दे पर मोदी सरकार को पूरी तैयारी के साथ आगे आने की जरूरत है। आगामी लोक सभा चुनाव के साथ-साथ विधानसभा चुनाव कराना व्यावहारिक नहीं होगा। सबसे पहले तो इस मसले पर राजनीतिक सहमति कायम करना अनिवार्य है। संवैधानिक बदलावों के साथ ही चुनावों से संबंधित बड़े पैमाने पर संसाधन जुटाने होंगे। इसके लिए चुनाव आयोग को पर्याप्त समय चाहिए।

यही वजह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत को फिलहाल इसको लागू करना असंभव जान पड़ रहा है। लेकिन भाजपा अध्यक्ष ने इस मसले पर जिस तरह से सक्रियता दिखाई है, उससे जाहिर होता है कि भाजपा लोक सभा चुनाव के साथ 10-11 राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव कराने का संकल्प कर चुकी है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान की विधानसभा का कार्यकाल अगले साल जनवरी में समाप्त हो रहा है। मिजोरम का कार्यकाल इसी साल दिसम्बर में समाप्त हो रहा है। इसी तरह, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, सिक्किम, तेलंगाना और अरुणाचल प्रदेश की विधानसभाओं का कार्यकाल अगले साल जून में खत्म हो रहा है।

इन राज्यों के चुनाव लोक सभा के साथ होने में कोई समस्या नहीं है। भाजपा शासित हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र की विधानसभाओं का कार्यकाल लोक सभा चुनाव के कुछ महीनों बाद होने वाले हैं। अगर इन राज्यों का चुनाव एक साथ कराना होगा तो इनकी विधानसभाओं को महीनों पहले भंग कराना होगा। लेकिन अहम सवाल यह है कि भाजपा इस मुद्दे पर बगैर राजनीतिक सहमति बनाये आगे बढ़ने का जोखिम उठाएगी। भाजपा के लिए ऐसा करना आत्मघाती साबित हो सकता है।