अभी की चुनौतियां

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एक विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के आधार पर एक बार फिर सरकार-भाजपा और कांग्रेस में तलवारें खिंच गई हैं। इस विशेषज्ञ समिति के आंकड़ों से साफ है कि यूपीए सरकार के कार्यकाल के आर्थिक आंकड़े एकदम डुबाऊ नहीं थे, बल्कि पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने साफ किया कि आजादी के बाद सबसे तेज विकास का दशक यूपीए सरकार के नाम ही रहा। इस पर भाजपा की प्रतिक्रियाओं का आशय है कि अभी इस रिपोर्ट के आंकड़ों को अंतिम तौर पर स्वीकृत नहीं किया गया है, इसलिए इन्हें आधिकारिक नहीं माना जा सकता।

राजनीतिक विमर्श अपनी जगह है पर आंकड़ों का गहन विश्लेषण बताता है कि अर्थव्यवस्था की कोई भी दो कालावधियां एक सी नहीं होतीं। उनकी अपनी चुनौतियां होती हैं, अपने मौके होते हैं। फिर भी कालावधियों के कामकाज का तुलनात्मक अध्ययन तो होता ही है। मोटे तौर पर साफ होता है कि यूपीए के शासन में तीन बड़ी समस्याएं थीं, जो एनडीए सरकार को विरासत में मिलीं। एक, महंगाई।

दूसरी, राजकोषीय घाटा और तीसरी, बैंकिंग सेक्टर का डूबत कर्ज। महंगाई का हाल विकट था। हालिया आंकड़ों के हिसाब से खुदरा महंगाई की दर जुलाई, 2018 में 4.17 प्रतिशत थी, ठीक छह साल पहले जुलाई, 2012 में यह दर इससे दोगुनी यानी 9.84 प्रतिशत थी। यूपीए सरकार के गमन में महंगाई की खासी बड़ी भूमिका थी। राजकोषीय घाटे पर भी यूपीए सरकार अंकुश नहीं लगा पाई थी। बैंकिंग सेक्टर के डूबत कजरे का बड़ा हिस्सा उसी दशक में खड़ा हुआ था, जिसे चिदंबरम तेज विकास का दशक बता रहे हैं। मोदी सरकार की आर्थिक विफलताओं में से एक है कि निर्यात के मोच्रे पर यह कुछ खास नहीं कर पाई।

कच्चे तेल के भावों में कमी का सीधा फायदा उपभोक्ताओं को नहीं मिला, बल्कि सरकार ने उस बचत को भी अपने नियमित खर्च में शामिल कर लिया। तो साफ होता है कि दोनों सरकारों के कार्यकाल में अलग-अलग तरह की समस्याएं सामने आई। जरूरत इस बात की है कि अब की सरकार आज की आर्थिक चुनौतियों को ईमानदारी से चिह्नित करे। रोजगार सृजन का मसला बड़ा मसला है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था गंभीर चुनौतियां का सामना कर रही है। सरकार इस पर त्वरित गति से ध्यान दे। यही वक्त की आवश्यकता है।