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केंद्र सरकार को जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों के विरुद्ध घोषित एकतरफा संघर्ष विराम को विवश होकर वापिस लेना पड़ा क्योंकि इसका सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आया। यह संघर्ष विराम रमजान के पाक महीने के दौरान घोषित किया गया था। सरकार के इस नरम रुख का जवाब आतंकवादियों ने हिंसा से दिया। संघर्ष विराम के दौरान सुरक्षा बलों पर हमले होते रहे।

एक स्थानीय पत्रकार और भारतीय सेना के जवान औरंगजेब को अगवा कर बेरहमी से हत्या कर दी गई। इसका मतलब है कि आतंकवादियों ने सरकार के शांति प्रस्ताव को रद्दी की टोकरी में डाल दिया। अलबत्ता, कश्मीर घाटी में हाल फिलहाल अमन चैन की वापसी की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। सच है कि घाटी में भाजपा का कोई जनाधार नहीं है, लिहाजा केंद्र सरकार भी वहां प्रभावहीन है।

पिछले चुनाव के बाद घाटी में अपनी जमीन तैयार करने की रणनीति को सामने रखकर भाजपा पीडीपी के साथ मिलकर सरकार चला रही है, लेकिन उसे अब तक कोई कामयाबी नहीं मिल पाई है। सूबे की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की लोकप्रियता भी तेजी से गिरती जा रही है, और उनका जनाधार भी खत्म हो रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही है कि महबूबा मुफ्ती के पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद ने सूबे में पूर्व अलगाववादी ताकतों के सहयोग से पीडीपी का राजनीतिक ढांचा खड़ा किया था। अब महबूबा मुफ्ती भाजपा के सहयोग से सरकार चला रही हैं, लिहाजा अलगाववादी शक्तियां पूरी तरह से उनके खिलाफ हो गई हैं।

गौर करने वाली बात है कि महबूबा मुफ्ती दक्षिण कश्मीर से आती हैं, और इन दिनों आतंकवादी गतिविधियों का केंद्र स्थल दक्षिण कश्मीर बना हुआ है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती अलगाववादी-आतंकवादी ताकतों के मुख्य निशाने पर हैं। दूसरी ओर पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते हद से ज्यादा खराब हो गए हैं।

वहां की सेना और सरकार की ओर से अलगाववादियों को लगातार समर्थन मिल रहा है। ऐसी स्थिति में यह कहना मुश्किल है कि कश्मीर में अमन-चैन कब कायम होगा। सरकार भी जानती है कि महज गोली और बंदूक से शांति कायम नहीं हो सकती, लेकिन आतंकवादियां के खिलाफ सैन्य अभियान फिर से शुरू करने के सिवाय सरकार के पास कोई  दूसरा विकल्प भी नहीं है।