अब उच्च शिक्षा आयोग

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नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की जगह उच्च शिक्षा आयोग बनाने के फैसले को लेकर कोई अंतिम निष्कर्ष देना अभी जल्दबाजी होगी। हालांकि यह एक बड़ा कदम है और इसके पीछे उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार तथा भ्रष्टाचार का अंत करने का उद्देश्य है। उच्च शिक्षा आयोग अधिनियम के मसौदे को मंजूरी मिल चुकी है। इस पर आम लोगों से उनकी राय मांगी गई है जिसकी अंतिम तिथि 7 जुलाई है। उच्च शिक्षा आयोग के मसौदे के अनुसार शैक्षिक संस्थानों के प्रबंधन मुद्दों में सरकार का हस्तक्षेप न के बराबर होगा।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के विपरीत इसके पास वित्तीय अधिकार नहीं होंगे। उसका फोकस विश्वविद्यालयों के पठन-पाठन, शोध क्षेत्र आदि में हो रहे कार्यों पर रहेगा। इसका अर्थ हुआ कि शैक्षिक संस्थानों को दिए जाने वाले अनुदान आदि के काम मानव संसाधन मंत्रालय करेगा और आयोग केवल अकादमिक कामों तक सीमित रहेगा। प्रस्तावित आयोग के पास अकादमिक गुणवत्ता मानकों के अनुपालन को लागू करने की पूरी शक्तियां होंगी और इसमें उप-मानक और फर्जी संस्थानों को बंद करने की शक्ति होगी। विश्वविद्यालयों की मान्यता  का कार्य ऑनलाइन किया जाएगा।

इससे उम्मीद यह की जा रही है कि मान्यता के लिए कार्यालयों का चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा। यानी आपने ऑनलाइन आवेदन किया और ऑनलाइन ही आपको सूचना मिल जाएगी। अभी निजी और डीम्ड जैसे विश्वविद्यालयों के लिए नियम मंत्रालय से तय होते है। इसके बाद सभी विश्वविद्यालयों के लिए एक ही आयोग को होना अच्छा होगा। इससे शिक्षा प्रबंधन और पाठ्यक्रम में एकरूपता आएगी। साथ ही फर्जी डिग्री बांटने वाले संस्थानों पर सीधी कार्रवाई और मान्यता रद्द करने का रास्ता खुलेगा।

इसमें कोई दो राय नहीं कि उच्च शिक्षा क्षेत्र के बेहतर प्रशासन के लिए नियामक एजेंसियों में सुधार की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी। बिना पूर्ण आधारभूत संरचना के विश्वविद्यालयों को मान्यता तथा उन्हें ग्रांट देने आदि की लगातार शिकायतें आ रही थीं। देश भर में ऐसे संस्थान और विश्वविद्यालय खुल गए हैं, जो डिग्रियां बेचते हैं। यह शिक्षा के साथ क्रूर अपराध है। अगर प्रस्तावित आयोग इसका अंत कर सके तो भारतीय शिक्षा प्रणाली की बहुत बड़ी सेवा होगी। किंतु क्या ऐसा हो पाएगा? केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा है कि इससे इंस्पेक्टर राज का भी खात्मा होगा।