अब्दुल्ला का तेवर

,

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारु ख अब्दुल्ला ने इस समय जो तेवर अपनाया हुआ है, उसका रहस्य समझना जरा कठिन है। पहले उन्होंने कहा कि सरकार जब तक 370 एवं 35 ए के बारे में अपना मत स्पष्ट नहीं करती, वह पंचायत चुनाव का बहिष्कार करेंगे। अब वह कह रहे हैं कि सारे चुनावों का बहिष्कार करेंगे।

सारे चुनाव से मतलब लोक सभा चुनाव और यदि जम्मू-कश्मीर से राज्यपाल शासन खत्म होता है तो विधानसभा चुनाव भी। यह विचित्र स्थिति है। पंचायत चुनाव के बहिष्कार से दो दिन पहले ही उन्होंने एक भाषण में कहा था कि यह बहुत जरूरी है। इससे लोगों को अपने निर्णय का अधिकार मिलता है और जो आरोप लगता है कि भारत में यहां के लोगों को स्वायत्तता नहीं वह गलत साबित होता है।

उन्होंने लोगों से इसमें भाग लेने की भी अपील की थी। तो फिर ऐसा क्या हो गया कि उन्हें अपना तेवर अचानक इतना कड़ा करना पड़ा है? माना जा रहा है कि उन्हें पार्टी के निचले स्तर से कुछ फीडबैक मिला है। इसमें नेशनल कांफ्रेंस के अनुकूल परिस्थितियां नहीं बताई गई हैं। हो सकता है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की श्रद्धांजलि सभा में उनके द्वारा भारत माता की जय और जय हिन्द का नारा लगाने के बाद ईद की नमाज में कुछ लोगों ने जैसा विरोध किया, उसका असर अन्यत्र भी हो। दूसरे, यह चर्चा गर्म है कि भाजपा के साथ मिलकर उनकी पार्टी पीडीपी के टूटने वाले विधायकों को मिलाकर सरकार बना सकती है।

तो वह ऐसे तेवर से यह साबित करने की कोशिश कर रहे हों कि जम्मू-कश्मीर के विशेष अधिकार के मामले में उनका तेवर पहले की तरह ही कायम है। इस मामले पर वह समझौता नहीं कर सकते। यह सच है तो वह अपने समर्थकों का विश्वास कायम रखने और भविष्य में सरकार बनी तो उसका आधार बनाने की रणनीति पर चल रहे ह

किंतु यह अत्यंत ही चिंताजनक और खतरनाक रवैया है। फारु ख अब्दुल्ला को इसकी जगह भारत माता की जय और जय हिन्द के बारे में वहां के लोगों को समझाना चाहिए था। उन्हें बताना चाहिए था कि भारत का हमारे लिए क्या मायने है और पाकिस्तान किस तरह हमारे लिए दुश्मन देश है। इसकी जगह इस प्रकार का तेवर अपनाकर वह अलगाववाद की भावना को बढ़ाने की ही भूमिका निभा रहे हैं। इसमें देश उनके साथ कभी सहानुभूति प्रदर्शित नहीं कर सकता।