अपराध और सजा

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सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी पूरे न्यायतंत्र के लिए सीख होनी चाहिए कि अगर अपराधियों को उनके गुनाह के लिए पर्याप्त सजा नहीं दी गई तो लोग सड़क पर ही बदला ले लेंगे। बात बहुत साफ है कि अगर अदालतें अपराधी को सजा देने में विफल होंगे तो जो पीड़ित है उसके अंदर प्रतिशोध का भाव पैदा होगा और वह कानून हाथ में लेने और हिंसा करने को विवश हो जाएगा। राजस्थान के सांभरलेक जिले में आज से ढाई दशक पहले जमीन विवाद को लेकर मोहनलाल और उसके साथी ने कपूरचंद और फूलचंद पर जानलेवा हमला किया था। उसमें दोनों घायल हुए थे और एक के सिर में गहरी चोट आई थी।

साक्ष्यों के आधार पर सत्र न्यायालय ने अभियुक्तों को दंड संहिता की धाराओं के अनुसार तीन-तीन वर्ष जेल की सजा दी थी। किंतु उच्च न्यायालय ने सत्र न्यायालय का फैसला बदलकर केवल छह दिन कर दिया। उतने दिन अभियुक्त हिरासत में रह चुके थे। सर्वोच्च  न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले पर हैरत जताते हुए इनको छह महीने की सजा और 25 हजार का जुर्माना लगाया है।

न्यायालय का तर्क है कि सिर का घाव जानलेवा हो सकता था। इसलिए उनको पर्याप्त सजा और वह भी समय पर मिलना चाहिए था। उच्च न्यायालय ने आपसी मारपीट का सामान्य घटना मानकर व्यवहार किया। 1992 में मामला आया और फैसला हुआ 2015 में। हालांकि दोनों पक्षों में तब तक सुलह हो गई थी, जिसे न्यायालय के संज्ञान में लाया जा चुका था।

उच्च न्यायालय ने इसको महत्त्व दिया। किंतु राजस्थान सरकार की अपील को दोनों पक्षों के सुलह के बावजूद सर्वोच्च न्यायालय ने निरस्त करने योग्य नहीं माना। उसके अनुसार अपराध अपराध है। न्यायालय ने उच्च न्यायालय के रवैये पर हैरत जताया है। जैसा सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है हर अपराध के लिए भारतीय दंड संहिता में अधिकतम और न्यूनतम सजा का प्रावधान है।

यह फैसला एक प्रकार से सभी न्यायालयों के लिए मार्ग निर्देश की तरह है। अपराध के शिकार व्यक्ति की पीड़ा और आपराधिक कृत्य के बीच संतुलन कायम करके ही जेल में काटी जाने वाली अवधि तय की जाती है। इसका अर्थ हुआ कि आपने अपराध करने के बाद यदि पीड़ित के साथ सुलह कर लिया तो भी आप सजा से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकते।