अनुछेद 35 ए : दो टूक फैसला जरूरी

सुशील कुमार सिंह,

भारतीय संविधान में जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दरजा प्राप्त है। यह स्थिति अनुच्छेद 370 के तहत है। मगर बीते एक वर्ष से अनुच्छेद 35ए को लेकर कोहराम मचा हुआ है। विभाजन के समय बड़ी संख्या में पाकिस्तान से शरणार्थी भारत आए थे, जिनमें लाखों की तादाद में जम्मू-कश्मीर में रह रहे हैं। अनुच्छेद 35ए के जरिए ही इन सभी भारतीय नागरिकों को जम्मू-कश्मीर सरकार ने स्थायी निवास प्रमाण पत्र से वंचित कर दिया जिनमें 80 फीसद लोग पिछड़े और दलित हिन्दू समुदाय से हैं। इतना ही नहीं जम्मू-कश्मीर में विवाह कर बसने वाली महिलाओं और अन्य भारतीय नागरिकों के साथ यहां की सरकार इस अनुच्छेद की आड़ लेकर भेदभाव करती है। इसी को लेकर इसे हटाने की मांग हो रही है। अनुच्छेद 35ए में यह भी है कि अगर जम्मू-कश्मीर की लड़की बाहर के किसी लड़के से शादी करे तो उसके सारे अधिकार खत्म हो जाएंगे। इतना ही नहीं उसके बच्चों के अधिकार भी खत्म हो जाते हैं।

गौरतलब है कि जब 1956 में जम्मू-कश्मीर का संविधान बनाया गया था, तब स्थायी नागरिकता को कुछ इस प्रकार परिभाषित किया गया था। संविधान के अनुसार स्थायी नागरिक वह व्यक्ति है जो 14 मई, 1954 को राज्य का नागरिक रहा हो या फिर उससे पहले के दस वर्षो से राज्य में रह रहा हो और वहां संपत्ति अर्जित की हो। इसी दिन तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने एक आदेश पारित किया, जिसके तहत संविधान में अनुच्छेद 35ए जोड़ा गया था। सवाल है कि क्या अनुच्छेद 35ए, अनुच्छेद 370 का ही हिस्सा है, और 35ए को हटाने पर क्या अनुच्छेद 370 स्वयं हट जाएगा।
सर्वोच्च न्यायालय में अनुच्छेद 35ए को हटाए जाने  को लेकर सुनवाई शुरू हो गई है। अनुच्छेद 35ए को लेकर आरएसएस के नजदीकी गैर-सरकारी संगठन वी द पीपुल्स ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रखी है, जिसमें उन्होंने कहा है कि इसी अनुच्छेद के कारण भारतीय संविधान में प्रदत्त समानता के अधिकार के अलावा मानवाधिकार का भी घोर हनन हो रहा है। गौर करने वाली बात है कि अनुच्छेद 35ए के तहत पश्चिमी पाकिस्तान से आकर बसे शरणार्थियों और पंजाब से यहां लाकर बसाए गए वाल्मीकि समुदाय के लोग नागरिकता से वंचित हैं।
कश्मीरी पण्डित अनुच्छेद 35ए हटाने के पक्ष में हैं। उनकी दलील है कि इस अनुच्छेद से हमारी बेटियों को दूसरे राज्य में विवाहित होने के बाद अपने सभी अधिकार जम्मू-कश्मीर से खोने पड़ रहे हैं। हतप्रभ करने वाली बात यह है कि भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 से लागू है, और संविधान के अनुच्छेद 1 में यह स्पष्ट है कि भारत राज्यों का संघ है, और उसी संघ का 15वां राज्य जम्मू-कश्मीर है। पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस और तो और सीपीआई (एम) भी अनुच्छेद 35ए को हटाने के पक्ष में नहीं है। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन्हें सियासत की चिंता है, वहां के बाशिंदों की नहीं। जम्मू-कशमीर से आईएएस टॉपर रहे शाह फैजल ने भी विवादित ट्विीट किया है, जिसमें उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 35ए हटाने से जम्मू-कश्मीर का भारत से रिश्ता खत्म हो जाएगा। उन्होंने इस रिश्ते को निकाहनामा से जोड़ा है।
राजनेता हो या बुद्धिजीवी वर्ग अनुच्छेद 35ए को लेकर अपनी-अपनी व्याख्या में करने में लगा है जबकि वहां के नागरिक मौलिक अधिकार और मानवाधिकार, दोनों के खतरे से जूझ रहे हैं। अनुच्छेद 35ए जम्मू-कश्मीर की विधानसभा को अधिकार देता है कि वह स्थायी नागरिक की परिभाषा तय कर सके। अब यह अनुच्छेद न्यायालय की शरण में है, और फैसला आने वाले दिनों में जब होगा तभी दूध का दूध और पानी का पानी होगा। फिलहाल, जिस तर्ज पर समस्या बढ़ी है, उसका हल इतना आसान भी प्रतीत नहीं होता। राजनीतिक फलक पर जब अनुच्छेद 370 हटाने की बात जोर पकड़ती थी, तब भी सियासत गरम होती थी, और जम्मू-कशमीर में लोग इसे लेकर सतर्क हो जाते थे। अब अनुच्छेद 35ए को लेकर घाटी में वह सब किया जा रहा है, जिसके चलते वहां का अमन-चैन पटरी से उतरा है। कह सकते हैं कि अब गेंद न्यायालय के पाले में है, और उसका निर्णय ही इस पर रोशनी डालने का काम करेगा। दोटूक बात यह भी है कि जम्मू-कशमीर मुख्यत: कश्मीर अलगाववादियों, आतंकवादियों और स्वार्थपरक सियासतदानों के हाथों खिलौना मात्र बनकर रह गया, यहां के नागरिकों का दोनों हाथों से शोषण हुआ।